प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अगस्त से एक सितंबर तक चीन के दौरे पर रहेंगे.
नरेंद्र मोदी यहां शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन यानी एससीओ सम्मेलन में हिस्सा लेंगे.
पीएम मोदी की चीन यात्रा ऐसे वक़्त पर हो रही है जब ऊंचे टैरिफ़ की वजह से अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों में तनाव दिख रहा है.
भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी हैं. पिछले पांच सालों में दोनों देशों के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण रहे हैं.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिएयहाँ क्लिककरें
लेकिन हाल में दोनों पक्ष अपने मुद्दों को सुलझाने के लिए बातचीत की कोशिश कर रहे हैं.
ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदा चीन की यात्रा पर दुनिया भर की निगाहें हैं.
यह नई कूटनीतिक सक्रियता बदलते भू-राजनीतिक हालात में सामने आई है. ख़ासकर ट्रंप के 'टैरिफ़ युद्ध' के बाद.
ऐसे में चीनी मीडिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे को किस नज़रिये से देख रहा है, आइए जानते हैं.
'अब रणनीतिक स्वायत्तता की अहमियत का पता चला'चीन के सरकारी अख़बार 'चाइना डेली' ने लिखा है कि पिछले सप्ताह भारत गए विदेश मंत्री वांग यी के दौरे को व्यापक तौर पर मोदी की यात्रा की तैयारी माना जा रहा है.
'चाइना डेली'ने लिखा है कि चीन और भारत का मेल-जोल वैश्विक परिस्थितियों से निपटने के लिए अहम है.
ख़ासकर तब जब अमेरिका की एकतरफ़ा दबाव बनाने की नीतियां और मुक्त व्यापार और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को दी जाने वाली चुनौतियां बढ़ रही हैं.
अख़बार लिखता है कि अमेरिका की ओर से दुनिया के ख़िलाफ़ टैरिफ़ वॉर छेड़ने के बाद भारत को यह सच स्वीकार करना पड़ा है कि नज़दीकी बढ़ाने के बावजूद वह अमेरिका के टैरिफ़ दबाव से नहीं बच सका.
"रूस से तेल की ख़रीद को न रोकने की वजह से अमेरिका के साथ भारत टकराव की स्थिति में फंस गया. उसके बाद भारत को रणनीतिक स्वायत्तता की अहमियत का पता चला है."
अख़बार ने लिखा है कि भारत को चीन को प्रतिद्वंद्वी या ख़तरे के तौर पर देखने के बजाय साझेदार और उसके हाई क्वालिटी डेवलपमेंट को एक मौक़े के तौर पर देखना चाहिए.
हांगकांग बेपटिस्ट यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर अर्जुन चटर्जी ने 'चाइना डेली'में ही एक लेख में लिखा कि अब सबकी निगाहें तियानजिन में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन पर है, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी शामिल हो रहे हैं.
उन्होंने लिखा है कि ट्रंप की ओर से टैरिफ़ लगाए जाने के बाद चीन ने भारत के साथ एकता दिखाई है. चीन के राजदूत ने अमेरिकी क़दम को धौंस दिखाने की कार्रवाई माना.
उन्होंने लिखा कि पीएम मोदी ने साफ़ किया है कि भारत अपने किसानों, मछुआरों और डेयरी क्षेत्र के हितों से समझौता नहीं करेगा.
अर्जुन चटर्जी ने लिखा है कि ग्रीन एग्रीकल्चर, ख़ासकर नाइट्रोजन यूज़ एफ़िशिएंसी, ऐसा क्षेत्र है जहां भारत और चीन तेज़ी से काम करते हैं. पर्यावरण और आर्थिक दोनों तौर पर ये बेहतर क़दम होगा.
वह लिखते हैं कि तियानजिन शिखर सम्मेलन में अगर कनेक्टिविटी, दोनों देशों के लोगों के आने-जाने, ग़ैर कृषि व्यापार और पर्यावरण साझेदारी पर कोई समझौता होता है तो ये एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच प्रतिस्पर्धा के बावजूद व्यावहारिक सहयोग का रास्ता हो सकता है.
- किम जोंग और पुतिन को बुलाकर अमेरिका को क्या दिखाना चाहता है चीन
- 'अब भारत ने समझा, चीन से दोस्ती क्यों है ज़रूरी', ऐसा क्यों कह रहा है चीनी मीडिया
- तिब्बती संघर्ष के गढ़ से बीबीसी की रिपोर्ट, चीनी दबदबे के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते लोग

सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ और कुछ दूसरी एजेंसियों की रिपोर्ट में भले ही सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा का ज़िक्र न हो लेकिन वह भारत के ख़िलाफ़ अमेरिका के टैरिफ़ का मुद्दा उठाती हुई दिखती हैं.
'शिन्हुआ' की रिपोर्ट में लिखा गया है कि अमेरिका ने 27 अगस्त से भारतीय निर्यात पर अतिरिक्त 25 फ़ीसदी 'पेनल्टी टैरिफ़' लगा दिया है.
इससे भारत पर टैरिफ़ 50 फ़ीसदी हो गया है. अमेरिका ने इसके लिए रूस से तेल आयात को कारण बताया है.
इसकी वजह से भारत का लगभग 48 अरब डॉलर का निर्यात प्रभावित होगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि छोटे कारोबारियों, किसानों और पशुपालकों के हितों की रक्षा की जाएगी और भारत किसी भी दबाव का सामना करेगा.
उन्होंने जीएसटी में तेज़ सुधार की घोषणा की है. दूसरी ओर भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का नया दौर रुक गया है.
वहीं राष्ट्रवादी रुझान वाली समाचार वेबसाइट 'गुआंचा' में कहा गया है कि 'विशेषज्ञों का कहना है कि भारत चीन से रिश्ते सुधारकर अमेरिका के साथ सौदेबाज़ी क्षमता बढ़ाना चाहता है.'
"मोदी पिछले साल से ही अमेरिका की ओर झुकाव वाली नीति को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कि वह चीन और रूस के साथ कितनी दूरी तक जाएंगे."
भारत एससीओ और क्वाड दोनों का हिस्सा है और ख़ुद को किसी एक गुट से बंधा मानने से इनकार करता है.
फिर भी भारत ने कई मौक़ों पर एससीओ में चीन-रूस की पहल को चुनौती दी है, जैसे संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर न करना और अंग्रेज़ी को कामकाजी भाषा बनाने की मांग करना.
गुआंचा में छपी रिपोर्ट में लिखा गया है, "भारत 'दोनों पक्षों के साथ खेलने' की नीति से अमेरिका-चीन के बीच संतुलन साध रहा है. हालांकि ट्रंप 2.0 काल में यह संतुलन कठिन होता जा रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
- 'ट्रंप इसी राह पर चले तो...', अमेरिकी टैरिफ़ से क्या भारत और चीन आएंगे क़रीब?
- लिपुलेख पर भारत और नेपाल फिर आमने-सामने, चीन के साथ क़रार बना नाराज़गी की वजह?
- चीन ने अमेरिका से कहा- हर तरह की जंग के लिए तैयार, जानिए दोनों देशों में कौन कितना ताक़तवर?
You may also like
क्या लिव-इन सचमुच कुत्तों का कल्चर है? बाबा अनिरुद्धाचार्य का बयान वायरल!
डिजिटल, पारदर्शी और नागरिक-हितैषी की ओर महाराष्ट्र : सीएम देवेंद्र फडणवीस
संघ प्रमुख खुद अपने बयान से पीछे हट गए: सपा नेता रविदास मेहरोत्रा
Xiaomi 15T Pro में मिलेगा Leica कैमरा और 5x ज़ूम, क्या DSLR को देगा टक्कर?
सोनू सूद लॉन्च करेंगे स्टार प्लस का नया शो 'संपूर्णा'