नेपाल में एक बड़ी आबादी का दो दशक के भीतर ही गणतांत्रिक व्यवस्था से मोहभंग होना बताता है कि इन लोगों की उम्मीदें किस तरह टूट चुकी हैं। वहां राजशाही को वापस लाने की मांग हो रही है। चिंताजनक बात यह है कि गणतंत्र और राजशाही समर्थक आमने-सामने हैं और इसका खामियाजा पूरे देश को हिंसा व अस्थिरता के रूप में भुगतना पड़ रहा है। गंभीर स्थिति: नेपाल में इस समय विभाजन साफ तौर पर देखा जा सकता है। एक तरफ तमाम लोकतंत्र समर्थक दल हैं और दूसरी तरफ राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP)। 2008 में जब व्यापक जन आंदोलन के बाद संविधान सभा का गठन किया गया और राजा के शासन का अंत हुआ, उसके बाद से राजशाही समर्थक कभी इतने मजबूत और आक्रामक नहीं रहे। बीते शुक्रवार को जिस तरह राजधानी काठमांडू में विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो उठा और उसमें जानें गई, वह स्थिति की गंभीरता को दिखाता है। राजा की सक्रियता: नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र बीर बिक्रम शाह ने हाल के वक्त में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। इसके पहले तक वह सार्वजनिक रूप से बहुत कम दिखा करते थे। लेकिन, 9 मार्च को जब वह पोखरा से काठमांडू पहुंचे, तो उनके स्वागत में हजारों की भीड़ इकट्ठा हो गई। इसके बाद भी वह कुछ मौकों पर जनता के बीच आए और लोगों ने उन्हें सपोर्ट किया। यह सब न तो अनायास लगता है और न ही इसे सामान्य माना जा सकता है। राजनीतिक अस्थिरता: नेपाल की जनता को क्यों फिर से अपने पूर्व राजा में उम्मीद दिखने लगी है? इसका जवाब है राजनीतिक दलों की विफलता। गणतंत्र लागू होने के बाद से यह देश 13 प्रधानमंत्री देख चुका है। किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया और गठबंधन की राजनीति ने कभी देश को स्थिरता नहीं दी। भ्रष्टाचार के आरोप: नेपाल की जनता का गुस्सा भ्रष्टाचार को लेकर भी है। कोई भी ऐसी पार्टी नहीं रही, जिसे करप्शन के आरोपों का सामना न करना पड़ा हो। इसी दौरान, नेपाल की इकॉनमी लगातार डांवाडोल होती चली गई। वर्ल्ड बैंक की 2024 की रिपोर्ट कहती है कि सरकार का बजट सही तरीके से खर्च नहीं हो पा रहा है, और यह समस्या 2018 से चली आ रही है। टैक्स कम मिल रहा है और विकास कार्यों पर खर्च बहुत धीमा है। वित्तीय वर्ष 24 में सुधार के बावजूद GDP ग्रोथ 3.9 है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि देश लोकतंत्र का रास्ता छोड़ दे।
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